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संसद भवन की खास बातें Source:-दृष्टि आईएएस drishti Ias आप आजकल कभी संसद भवन के आसपास से गुजरें तो समझ आ जाएगा कि देश की नई संसद की इमारत के निर्माण का कार्य शुरू हो चुका है। संसद भवन परिसर को बड़े-विशाल बोर्डों से घेर दिया गया है पर अंदर से बाहर आने वाली आवाजें बताती हैं कि नई संसद बनाई जा रही है। हालॉंकि पुराना संसद भवन बना रहेगा। उसके उपयोग को लेकर भी सरकार जल्दी फैसला लेगी। निश्चित रूप से भारतीय लोकतंत्र का सबसे अहम प्रतीक रहा है हरबर्ट बेकर द्वारा डिजाइन किया गया संसद भवन। बेकर ने अपने सीनियर और नई दिल्ली के चीफ टाउन प्लानर एडवर्ड लुटियंस के परामर्श से संसद भवन का डिजाइन तैयार किया था। इस निर्माण के वक्त दोनों में कई मुद्दों पर बहस होती रहती थी। बेकर इसके बड़े हॉल के ऊपर गुंबद बनवाना चाह रहे थे जबकि लुटियंस इसे गोलाकार रखने का पक्ष में थे। तब इसका नाम कौंसिल हाउस था। संसद भवन का निर्माण 1921-1927 के दौरान किया गया था। इसका उद्घाटन 18 जनवरी 1927 को हुआ था। संसद भवन वास्तुकला का एक उत्कृष्ट नमूना है। इसकी तुलना विश्व के सर्वोत्तम संसद भवनों के साथ की जा सकती है। यह एक विशाल वृत्ताकार...

कर्म या भाग्य...

अक्सर आप कर्म और भाग्य की तुलना करते होंगे।कई सारे  सवाल आपके लिए उलझनें खड़ा कर देती होंगी।कर्म बड़ा है तो फिर भाग्य का क्या मतलब,अगर भाग्य बड़ा होता है तो फिर कर्म करने की क्या जरूरत।यह सिर्फ आप ही नही बल्कि पूरी दुनिया इसी विडंबना में उलझी है।चलिए हम आपको एक बहुत ही सरल और सार्थक कहानी के माध्यम से इसे समझाते है कि "कर्म बड़ा या भाग्य"।                                    किसी गाँव में एक गरीब आदमी था।उसके साथ उसकी पत्नी रहती थी।जैसे तैसे उनका गुजर -बसर चलता था। एक बार भाग्य ने कहा देखो मैं कैसे इसे अमीर बना देता हूं।तब भाग्य ने उसे एक हीरे का हार दिया ,यह सोचकर कि वह गरीब आदमी इसे बेचकर अमीर हो जाएगा।खुशी के मारे वह गरीब आदमी पागल सा हो गया।घर जाते ही हीरे की हार को दीवार पर टाँग दिया और नहाने चला गया।वापस देखा तो हीरे की हार गायब था।उसके पड़ोसिन ने वह हार चुरा लिया। भाग्य ने दुबारा उस व्यक्तति को एक सोने की अंगुठी दिया।वह अंगूठी को पहनकर नहाने चला गया और वह अंगूठी तालाब में गिर गई।दुखी मन से घर...

दंड या माफी

          "यदि आप वास्तव में अपना हित चाहते हैं, अपनी उन्नति और सुधार चाहते हैं, तो गलती करने पर 'दंड मांगें', माफी नहीं।"         एक बच्चे ने स्कूल में एक गलती कर दी। किसी दूसरे बच्चे की पेंसिल चुरा ली। उसकी गलती पकड़ी गई। उसने अध्यापक से कहा, कि " मुझे माफ कर दीजिए, मैं भविष्य में दोबारा गलती नहीं करूंगा।" अध्यापक ने उसे माफ कर दिया। कोई दंड नहीं दिया। इस माफी देने का बच्चे के मन पर यह प्रभाव पड़ा, कि *"यह तो बहुत अच्छा हुआ, मैंने गलती भी की। सिर्फ दो शब्द बोल दिए, कि मुझे माफ कर दीजिए। और अध्यापक जी ने मुझे माफ कर दिया। दंड तो कुछ मिला नहीं। इसका मतलब गलती करने में कोई नुकसान नहीं है।"*          इस मनोवैज्ञानिक प्रभाव के आधार पर अब आप सोचिए, *"क्या वह बच्चा दोबारा वही गलती अथवा और कोई गलती करेगा या नहीं?"* अवश्य करेगा। मनोविज्ञान कहता है, *"जब उसे दंड तो मिला ही नहीं, तो वह बार बार गलती क्यों नहीं करेगा?"*             एक दिन ए...